प्राकृतिक कीटनाशी – सींगू बुगडा

सींगू बुगड़ा का प्रौढ़

सींगू बुगडा जिला जींद के परितंत्र में पाया जाने वाला एक सीधा-पादरा खून-चूसक परभक्षी है। वैसे तो यह कीट विभिन्न फसलों में पाए जाने वाले पच्चास से भी ज्यादा भांत-भांत के कीटों का खून चूस कर अपना जीवनयापन करता है। पर सुंडियां मिल जायें तो कहने ही क्या? मिल जाएँ कहीं फसलों में या खरपतवारों पर, इन्हें तो उनका खून चूस कर अपना पेट भरना होता है |

सींगू बुगड़ा के अर्भक

इस कीट के प्रौढ़ अमूमन आधा इंच लंबे होते हैं व इनके शरीर का रंग भूरा होता है। इनके मजबूत कन्धों पर सींगनुमा कांटे होते हैं शायद इसीलिए यहाँ के किसान इसे सींगु बुगडा कहते हों। पर वैज्ञानिक तो इसे अपनी भाषा में Podisus maculiveentris कहते हैं। इसके परिवार का नाम Pentatomidae तथा इसके वंश का नाम Hemiptera है। इनका प्रौढिय जीवन पैंतीस से पच्चास दिन का होता है। इस बुगडे की मादा अपने जीवनकाल में एक हज़ार तक अंडे दे सकती है। मादा अपने ये अंडे पत्तों की निचली सतह पर गुच्छों में देती है। एक गुच्छे में तकरीबन बीस से तीस अंडे होते हैं। इन अण्डों का रंग क्रीमी से लेकर काला तक होता है तथा देखने में पीतल के बरोले जैसे दिखाई देते हैं जिनके किनारों पर खड़े रुंग होते हैं। इन अण्डों से चार-पाँच दिन में निम्फ निकलते हैं जिनका सिर व धड़ काला तथा पेट सुर्ख लाल होता है। ये निम्फ पहली कान्झली उतारने तक तो बढ़ते ही रहते हैं तथा शेष निम्फल जीवन खून-चूसक परभक्षी के तौर पर बिताते हैं। इनका यह निम्फल जीवन पच्चीस-तीस दिन का होता है।

सींगू बुगड़ा के अंडे

इस बुगडे की मादाओं की खुराक अपने नर साथियों के मुकाबले ज्यादा होती है पर नरों की तुलना में जिंदगानी बहुत कम होती है। नर तो 180 दिन जिन्दा रहते हैं जबकि मादाएं तो सिर्फ़ 125 दिन ही जिन्दा रह पाती हैं। “ज्यादा खुराक-कम जिंदगी” के कारणों की तलाश या तो अति प्रकृति प्रेमी कर सकते है या फ़िर लगनशील कीट-वैज्ञानी।

सींगू बुगड़ा के अर्भक

हम किसानों का काम तो इस कीट की पहचान व इसके स्वभाव के बारे में मामूली जानकारी होने से ही चल जाएगा। इस कीट का मांसाहारी होना किसानों के हक की बात है। हमारे फसलतंत्र में इसका पाया जाना लाजिमितौर पर कीटनाशकों पर खर्च को कम करवाएगा क्योंकि ये बुगड़े भी तो अपने जीवनयापन के लिए कीटों को खत्म करते है | कीटों का नाश करने वाले को हो तो कीटनाशी कहते हैं |

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