कपास का शाकाहारी कीट – चित्तकबरी सुंडी

कुछ साल पहले तक हरियाणा प्रदेश में चितकबरी सूंडी कपास की फसल का मुख्य हानिकारक कीट होती थी। पर आजकल यह सूंडी कपास की फसल में बहुत कम दिखाई देती है। यह सूंडी पै समय का कहर है, या व्यापार का दोपहर है, कुछ कह नही सकते। हाँ, इतना जरुर है कि हरियाणा में किसान इस सूंडी को काला कीड़ा, धब्बेदार सूंडी व गोभ वाली सूंडी आदि नामों से जानते व पहचानते हैं।

हमारे यहाँ कपास की फसल में इस कीड़े की दो प्रजातियाँ पाई जाती है : इयरिआस विटैला और इयरिआस इन्सुलाना। इयरिआस विटैला नमी वाले मौसम में ज्यादा पाई जाती है तथा इयरिआस इन्सुलाना खुसकी वाले मौसम में ज्यादा पाई जाती है। इन कीट पंतगों की सिवासण पौधों के पत्तों, शाखाओं एवं फलीय भागों जैसे रोयेदार हिस्सों पर एक-एक करके 200 से 400 तक अण्डे देती हैं। इन अंडों का रंग हल्का नीला होता है। सामान्य परिस्थितियों में इन अंडों से तीन चार दिन बाद नन्ही सूंडियाँ निकलती हैं जो कपास के पौधों की गोभ व फलीय हिस्सों पर हमला करती हैं।

जिस कारण गोभ मुरझाकर सूख जाती हैं, बौकी व फूल झड़ जाते हैं, ग्रसित टिंडे समय से पहले खिल जाते हैं तथा टिंडों में फौहा खराब हो जाता है। इस कीड़े की लार्वल अवस्था तकरीबन 10 से 16 दिन की होती है। इसके बाद यह सूंडी प्यूपा बन जाती है। इस कीड़े की यह प्यूपीय अवस्था पौधे के विभिन्न भागों, झड़ी हुई बौकियों व अन्य अवशेषों पर लगभग 4 से 9 दिन में पूरी हो जाती है। इस प्यूपा से प्रौढ़ पतंगे निकलते हैं जो 8 से 20 दिन तक जीवित रहते हैं।

ये पतंगे रात को ही सक्रिय रहते हैं | रात को ही नर-मादा का मधुर मिलन होता है तथा रात को ही अंड-निक्षेपण | दिन में तो इन्हें छुपकर रहना होता है | अन्यथा लोपा मक्खी व डायन मक्खी इनका उड़ते हुए ही काम तमाम कर देती है | इस कीट के प्रौढ़ों व सुंडियों के लिए घात लगा कर बैठे भान्त-भान्त(दिद्ड बुग्ड़ा, कातिल बुग्ड़ा, सिंगू बुग्ड़ा, बिन्दुवा बुग्ड़ा, एंथू बुग्ड़ा) के बुग्ड़े भी कपास के खेत में किसानों ने देखे हैं | ये मांसाहारी बुग्ड़े इस कीट के अण्डों से जीवन-रस पीने में भी माहिर होते हैं |

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