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उत्तरकाशी में बादल फटने से भारी तबाही: चार मौतें, पचास से अधिक लापता, सेना ने संभाला मोर्चा

उत्तराखंड (Uttarakhand) के उत्तरकाशी (Uttarkashi) जिले में मंगलवार दोपहर को हुई भारी वर्षा और बादल फटने (cloudburst) की घटनाओं ने क्षेत्र में भयानक बाढ़ और तबाही मचा दी। यह घटना हर्षिल (Harsil) क्षेत्र में खीर गंगा नदी (Kheer Ganga river) के जलग्रहण क्षेत्र के पास शुरू हुई, जहां अचानक तेज बारिश ने नदियों का जल स्तर तेजी से बढ़ा दिया। कुछ घंटों बाद, धराली (Dharali) के निकट सुकी टॉप (Sukhi Top) नामक पर्यटन स्थल पर एक और बादल फटने की घटना हुई, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई। इस प्राकृतिक आपदा ने कम से कम चार लोगों की जान ले ली, जबकि पचास से अधिक व्यक्ति लापता हो गए, जिनमें सेना के आठ से दस जवान भी शामिल हैं। अधिकारियों का अनुमान है कि इस बाढ़ में लगभग चालीस से पचास घर बह गए, और कई सड़कें मलबे से अवरुद्ध हो गईं।

इस आपदा का प्रभाव स्थानीय निवासियों और पर्यटकों दोनों पर पड़ा। गस्कू (Gasku) और मालघाट (Malghat) जैसे इलाकों में भूस्खलन (landslides) के कारण धारचूला-गुंजी (Dharchula-Gunji) मार्ग बंद हो गया, जबकि ज्योतिर्मठ-मलारी (Jyotirmath-Malari) सड़क का एक हिस्सा पूरी तरह बह गया। नदियों में पानी की तेज धारा ने कई इमारतों को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे बचाव कार्य चुनौतीपूर्ण हो गया। उत्तरकाशी जिला हिमालयी क्षेत्र (Himalayan region) में स्थित है, जहां ऐसी घटनाएं आम हैं, लेकिन इस बार की तीव्रता ने 2013 की केदारनाथ (Kedarnath) बाढ़ की याद ताजा कर दी। उस समय की आपदा में हजारों लोगों की मौत हुई थी और लाखों यात्री फंस गए थे, जो उत्तराखंड के इतिहास में सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक थी। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड भारतीय हिमालय (Indian Himalayas) में बादल फटने की घटनाओं की संख्या के मामले में सबसे ऊपर है, जहां प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक होती हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department) के अनुसार, बादल फटना एक ऐसी स्थिति है जिसमें सीमित क्षेत्र में एक घंटे में सौ से ढाई सौ मिलीमीटर तक बारिश हो सकती है, साथ में तेज हवाएं और बिजली चमकना।

बचाव कार्यों में भारतीय सेना (Indian Army) की प्रमुख भूमिका रही, खासकर इबेक्स ब्रिगेड (Ibex Brigade) के जवानों ने हर्षिल कैंप से तुरंत कार्रवाई शुरू की, जो प्रभावित गांव से मात्र चार किलोमीटर दूर है। सेना ने लगभग पंद्रह से बीस लोगों को सुरक्षित निकाला और घायलों को चिकित्सा सुविधा प्रदान की। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (National Disaster Response Force – NDRF) ने तीन टीमें तैनात कीं, प्रत्येक में पैंतीस प्रशिक्षित सदस्य थे, जो बड़े स्तर पर बचाव अभियान चला रही हैं। राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (State Disaster Response Force – SDRF) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (Indo-Tibetan Border Police – ITBP) भी सहायता में शामिल हुए। इन एजेंसियों ने फंसे हुए यात्रियों को निकाला और प्रभावित क्षेत्रों में क्षति का आकलन किया। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से बात कर हर संभव सहायता का आश्वासन दिया, जिससे बचाव कार्यों में तेजी आई।

यह घटना जलवायु परिवर्तन (climate change) और हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी (fragile ecology) की याद दिलाती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऐसी घटनाओं के दौरान ऊंचे स्थानों पर शरण लेना चाहिए, क्योंकि निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा अधिक होता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में विकास कार्यों को पर्यावरण के अनुकूल बनाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसी आपदाओं की तीव्रता कम की जा सके। वर्तमान में बचाव अभियान जारी हैं, और अधिकारियों का प्रयास है कि लापता लोगों को जल्द से जल्द खोजा जाए।