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आरबीआई ने खोले 2421 वित्तीय साक्षरता केंद्र

भारत में वित्तीय साक्षरता (financial literacy) को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India – RBI) ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बड़ी आबादी बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं से अनजान रहती है। देश की आर्थिक प्रगति में वित्तीय समावेशन (financial inclusion) की भूमिका अहम है, क्योंकि इससे लोग बचत, ऋण और निवेश के बारे में बेहतर निर्णय ले सकते हैं।

हाल ही में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में इस संबंध में जानकारी साझा की, जिसमें बताया गया कि आरबीआई ने ग्रामीण इलाकों को कवर करने के लिए 2421 वित्तीय साक्षरता केंद्र स्थापित किए हैं। ये केंद्र 2017 से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (National Bank for Agriculture and Rural Development – NABARD) के सहयोग से चलाए जा रहे हैं, और इनका मुख्य उद्देश्य समुदाय-आधारित और नवीन तरीकों से लोगों को वित्तीय ज्ञान प्रदान करना है।

ये केंद्र औसतन तीन ब्लॉकों को कवर करते हैं, जिससे दूर-दराज के गांवों तक पहुंच आसान हो जाती है। इनके माध्यम से ग्रामीण निवासियों को बैंकिंग उत्पादों (banking products), सामाजिक सुरक्षा योजनाओं (social security schemes), डिजिटल बैंकिंग (digital banking), मोबाइल बैंकिंग (mobile banking) और साइबर सुरक्षा (cybersecurity) जैसे विषयों पर जागरूकता फैलाई जाती है। विशेष रूप से माइक्रोफाइनेंस (microfinance) उधारकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, ताकि वे ऋण प्रबंधन और वित्तीय योजना में कुशल बन सकें।

NABARD ग्रामीण बैंक शाखाओं और वित्तीय साक्षरता केंद्रों (Financial Literacy Centres – FLCs) के जरिए साक्षरता शिविरों का आयोजन करता है, जहां कम जागरूकता वाले क्षेत्रों में लोगों को व्यावहारिक जानकारी दी जाती है। इसके अलावा, NABARD बैंकों और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशनों (State Rural Livelihoods Missions) के साथ मिलकर गांव स्तर पर कार्यक्रम चलाता है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups – SHGs) के सदस्यों को बैंक खाते खोलने, ऋण प्राप्त करने और चुकौती प्रक्रिया में सहायता प्रदान की जाती है।

आरबीआई ने माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में ऋण पहुंच को सरल बनाने के लिए भी कई उपाय किए हैं। उदाहरण के लिए, माइक्रोफाइनेंस ऋण की परिभाषा को सरल बनाया गया है, जिसमें तीन लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले परिवारों को बिना गिरवी के ऋण उपलब्ध कराया जाता है। पहले की शर्त कि ऋण का 50 प्रतिशत आय सृजन के लिए होना चाहिए, अब हटा दी गई है, क्योंकि इसमें चिकित्सा और शिक्षा जैसी आवश्यकताओं को भी शामिल किया गया है।

उधारकर्ताओं की सुरक्षा के लिए मासिक ऋण चुकौती को मासिक आय के 50 प्रतिशत तक सीमित रखा गया है, और वसूली प्रक्रियाओं पर दिशानिर्देश जारी किए गए हैं ताकि बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (Non-Banking Financial Companies – NBFCs) कठोर तरीके न अपनाएं। ब्याज दरों को भी नियंत्रित किया गया है, ताकि वे अत्यधिक न हों और कम लागत वाले फंड्स वाले संस्थानों के लिए आरबीआई द्वारा निर्धारित सीमा के अंदर रहें।

इसके अतिरिक्त, स्व-नियामक संगठन (Self-Regulatory Organizations – SROs) जैसे सा-धान (Sa-Dhan) और माइक्रोफाइनेंस इंडस्ट्री नेटवर्क (Microfinance Industry Network – MFIN) अनुपालन को मजबूत करने में भूमिका निभाते हैं। वे उधारकर्ताओं की अधिक कर्ज लेने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करते हैं, जैसे प्रति उधारकर्ता ऋणदाताओं की संख्या सीमित करना। ये प्रयास भारत की वित्तीय समावेशन नीतियों का हिस्सा हैं, जो प्रधानमंत्री जन धन योजना (Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana – PMJDY) जैसी पहलों से जुड़े हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। कुल मिलाकर, ये केंद्र और संबंधित कार्यक्रम ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, जो आर्थिक स्थिरता और विकास को बढ़ावा देंगे।