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हिमाचल वैज्ञानिकों की नई शिमला मिर्च किस्म: मैक्सिकन क्रॉस से फंगस रोग पर विजय

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के कृषि वैज्ञानिकों ने शिमला मिर्च (Capsicum) की एक नई किस्म विकसित की है जो फाइटोफ्थोरा कैप्सिसी (Phytophthora capsici) नामक घातक फंगस से होने वाली ब्लाइट रोग (Blight disease) के प्रति मजबूत प्रतिरोध क्षमता प्रदर्शित करती है।

जिससे राज्य के हजारों किसानों को फसल नुकसान की समस्या से निजात मिलने की उम्मीद है, क्योंकि यह फंगस पौधों की जड़ों, तनों और फलों को सड़ाकर पूरी फसल को बर्बाद कर देता है और पारंपरिक दवाएं जैसे फंगीसाइड्स (Fungicides) इस पर अप्रभावी साबित होती हैं।

खासकर हिमाचल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में जहां उच्च नमी और ठंडी जलवायु इस रोग को फैलने में सहायता प्रदान करती है, तथा यहां शिमला मिर्च की खेती स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है जो किसानों की आजीविका को सीधे प्रभावित करती है।

इस नई किस्म को तैयार करने के लिए मैक्सिको (Mexico) से प्राप्त जंगली बेल पेपर (Bell pepper) की लैंडरेस किस्म सीएम-334 (CM-334), जो अपनी प्राकृतिक फंगस प्रतिरोधी गुणों के लिए विख्यात है, को हिमाचल की प्रसिद्ध किस्मों कैलिफोर्निया वंडर (California Wonder) और सोलन भरपूर (Solan Bharpur) के साथ क्रॉस ब्रीडिंग (Cross breeding) की तकनीक से संकरित किया गया, जिसके फलस्वरूप एक ऐसी किस्म उभरी जो न केवल रोग से लड़ने में सक्षम है बल्कि उच्च उत्पादकता और बेहतर गुणवत्ता भी सुनिश्चित कर सकती है।

इस महत्वपूर्ण शोध का नेतृत्व डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (Dr. YS Parmar University of Horticulture and Forestry, Nauni) के बायोटेक्नोलॉजी विभाग (Biotechnology department) की सहायक प्रोफेसर डॉ. अनुपमा सिंह (Dr. Anupama Singh) ने किया, जिसमें केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला (Central University, Dharamshala) और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला (Himachal Pradesh University, Shimla) के विशेषज्ञों का भी योगदान रहा, तथा इस अध्ययन के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नल जर्नल ऑफ जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (Journal of Genetic Engineering and Biotechnology) में प्रकाशित हुए हैं।

जो इसकी वैज्ञानिक मान्यता को मजबूत बनाते हैं। यह विकास हिमाचल के किसानों के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है, जो फसल सुरक्षा बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक दवाओं के उपयोग को कम करके पर्यावरण संरक्षण में सहायक होगा, और भारत जैसे देश में जहां जलवायु परिवर्तन (Climate change) कृषि को चुनौती दे रहा है।

ऐसी नवीन किस्में टिकाऊ खेती और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, हालांकि इस किस्म को व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध कराने में अभी कुछ वर्ष लग सकते हैं।