हरियाणा (Haryana) राज्य में फसल अवशेषों के प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। विशेष रूप से चरखी दादरी (Charkhi Dadri) जिले में, जहां कृषि गतिविधियां प्रमुख हैं, फसल अवशेषों जैसे पराली को जलाने की समस्या पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। यह समस्या उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में आम है, जहां धान की फसल के बाद बचे अवशेषों को जलाना वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण बनता है, जिससे दिल्ली (Delhi) जैसे शहरों में स्मॉग (smog) की स्थिति उत्पन्न होती है। सरकार इस समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक तरीकों को प्रोत्साहित कर रही है, जैसे कि अवशेषों को औद्योगिक उपयोग में लाना, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय भी मिल सके।
इसी दिशा में, फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management) योजना के तहत पराली की आपूर्ति शृंखला (straw supply chain) स्थापित करने के लिए अनुदान प्रदान किया जा रहा है। हाल ही में, आवेदन की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 7 अगस्त 2025 तक कर दिया गया है, ताकि अधिक से अधिक उद्योग इस योजना का लाभ उठा सकें। यह कदम उन उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है जो हरियाणा में स्थापित हैं और फसल अवशेषों का उपयोग करना चाहते हैं। योजना के अंतर्गत, उद्योगों को 65 प्रतिशत क्रेडिट-लिंक्ड अनुदान (credit-linked grant) मिलेगा, जो पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक मशीनरी और बुनियादी ढांचे की स्थापना में मदद करेगा।
योजना की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: 3000 मीट्रिक टन (MT) प्रति सीजन क्षमता वाली परियोजना के लिए कुल लागत लगभग 1 करोड़ रुपये निर्धारित है, जबकि 4500 मीट्रिक टन क्षमता वाली परियोजना के लिए 1.5 करोड़ रुपये। इन लागतों में मशीनों की खरीद शामिल है, जो अवशेषों को संग्रहित करने, परिवहन करने और उपयोग करने में सहायक होंगी। आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन है, जिसे विभागीय पोर्टल www.agriharyana.gov.in के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। आवेदनों की जांच जिला स्तर की कार्यकारी समिति (district-level executive committee) द्वारा की जाएगी, और उसके बाद राज्य स्तर की अनुमोदन समिति (state-level approval committee) को भेजा जाएगा। चयन में प्राथमिकता उन उद्योगों को दी जाएगी जो पूरी तरह से धान की पराली पर आधारित हैं और पिछले दो वर्षों में धान अवशेषों की खरीद का अनुभव रखते हैं।
यह योजना न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगी, बल्कि किसानों के लिए एक स्थिर बाजार भी प्रदान करेगी, जहां वे अपनी फसल अवशेषों को बेच सकें। इससे अवशेष जलाने की प्रवृत्ति कम होगी और जैव ऊर्जा (bioenergy) या अन्य औद्योगिक उपयोगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध होगा। चरखी दादरी जैसे कृषि प्रधान जिलों में इस प्रकार की पहल से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, साथ ही वायु गुणवत्ता में सुधार होगा। सरकार की यह रणनीति समग्र रूप से सतत विकास (sustainable development) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो कृषि और उद्योग को जोड़ती है।