गुलाबी सूंडी – कपास का कीड़ा

दुनिया भर में कपास के मुख्य हानिकारक कीटों में शुमार यह गुलाबी सूंडी आजकल हरियाणा में कम ही पाई जाती है। कीट वैज्ञानिक जगत में इस कीड़े को Pectinophora gossypiella के नाम से जाना जाता है। खानदान व गौत्र के हिसाब से यह कीट Lepidoptera क्रम के Gelechiidae कुल से संबंध रखता है। इस कीट की प्रौढ़ अवस्था यानि कि पतंगे आकार में छोटे व रंग में गहरे भूरे होते हैं। इसकी अगली पंखों पर काले धब्बे होते हैं तथा पिछली फंख किनारों से झालरनुमा होती हैं। रात को सक्रिय रहने वाले ये पतंगे शमा के प्रेम में परवान चढने वाले होते हैं। यह कीड़ा जुलाई से नवंबर तक सक्रिय रहता है।

हर साल कपास के खेत में इसके मादा पतंगों की पहली पीढी तो बौकियों पर या फिर बौकियों के नजदीक टहनियों, छोटी व कच्ची पत्तियों के निचले हिस्सों पर एक एक करके सफेद व चपटे अंडे देती हैं। इसके बाद वाली पीढियां अपने अंडे एक-एक करके ही फूलों के बाह्यपुंजदल पर देती हैं। सामान्यतौर पर 3 से 4 दिनों में इन अंडों से तरुण सूंडियाँ निकलती हैं। पर ताप व आब की अनुकूलता अनुसार यह अंड-विस्फोटन आगे व पिछे भी हो सकता है। प्रारम्भिक अवस्था में ये सूंडियाँ क्रीमी कलर की होती हैं परन्तु बाद में इनका रंग गुलाबी हो जाता है। याद रहे यह रंगपलटी इन सूंडियों की चौथी कायापलटी में जाकर होती है। ये सूंडियां कपास की फसल में बौकियों व फूलों पर हमला करती हैं। सूंडियों से ग्रसित फूल पूरी तरह नही खुलते। कपास के ये ग्रसित फूल बनावट में फिरकी या गुलाब के फूल जैसे हो जाते हैं। शुरुआती अवस्था में ही ये तरुण सूंडियां छोटे-छोटे टिंडों में घुस कर कच्चे बीजों को खाती हैं। टिंडे में घुसने के लिये बनाएं अपने सुराख को अपने मल से ही बंद कर देती है। इस कीट की यह सूंडिय अवस्था लगभग 12 से 15 दिन की होती है।

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