पश्चिम बंगाल के मालदा (Malda) जिले में कृषि विभाग की एक पहल के तहत लगभग 500 किसान पारंपरिक सुगंधित धान चावल की किस्मों को फिर से जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह अभियान न केवल कृषि विरासत को संरक्षित करने का माध्यम है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है। धान की इन किस्मों में ललाट (Lalat), क्षितिश (Kshitish) और बीबी-11 (BB-11) शामिल हैं, जो पहले लोकप्रिय थीं लेकिन आधुनिक उच्च उपज वाली किस्मों के कारण विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गईं।
यह पहल अमान (Aman) मौसम की फसल पर केंद्रित है, जो मानसून के दौरान उगाई जाती है। जिले के हबीबपुर (Habibpur), गाजोल (Gazole) और बामनगोला (Bamangola) ब्लॉकों में फैली लगभग 30 हेक्टेयर भूमि पर यह खेती की जा रही है। पारंपरिक तरीकों से अलग, यहां बीजों को प्रसारण विधि (broadcasting method) से बोया जा रहा है, जिसमें रोपाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे खेती की लागत कम हो जाती है, हालांकि उपज थोड़ी कम हो सकती है। कृषि विभाग किसानों को मुफ्त बीज, उर्वरक और प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है, ताकि वे इन किस्मों को सफलतापूर्वक उगा सकें।
पृष्ठभूमि में देखें तो भारत में हजारों देशी चावल की किस्में मौजूद हैं, जो स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल होती हैं। ये किस्में पोषण से भरपूर होती हैं और कीटों तथा रोगों के प्रति प्रतिरोधी भी। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, हरित क्रांति (Green Revolution) के दौरान उच्च उपज वाली हाइब्रिड किस्मों (hybrid varieties) के प्रचार ने इन पारंपरिक किस्मों को पीछे धकेल दिया। परिणामस्वरूप, जैव विविधता (biodiversity) में कमी आई और किसानों की आय पर असर पड़ा। मालदा जैसे क्षेत्रों में, जहां सुगंधित चावल की मांग हमेशा रही है, इन किस्मों का पुनरुद्धार बाजार में नई संभावनाएं खोल सकता है। ये चावल जैविक (organic) और सुगंधित होने के कारण विशेष बाजारों में अच्छी कीमत पर बिकते हैं, जो सामान्य चावल से अधिक लाभ प्रदान करते हैं।
यह अभियान चुनौतियों से मुक्त नहीं है। पुरानी तकनीकों और कम उत्पादकता के कारण इन किस्मों को पहले छोड़ दिया गया था। लेकिन वर्तमान में, उपभोक्ताओं की बढ़ती रुचि स्वास्थ्यवर्धक और स्थानीय उत्पादों की ओर है, जो इस प्रयास को प्रोत्साहन दे रही है। यदि यह पहल सफल रही, तो इसे अन्य क्षेत्रों में विस्तारित किया जा सकता है, जिससे कृषि क्षेत्र में स्थिरता और विविधता बढ़ेगी। कुल मिलाकर, यह कदम कृषि विभाग की दूरदर्शिता को दर्शाता है, जो किसानों को आधुनिक आवश्यकताओं के साथ पारंपरिक ज्ञान को जोड़ने में मदद कर रहा है।